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मायापुरी हरिद्वार: आस्था, इतिहास और आध्यात्मिकता की अनंत धारा

  • Writer: Dr Amrit Karmarkar
    Dr Amrit Karmarkar
  • 6 days ago
  • 4 min read

अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवंतिका।

पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः॥


इस श्लोक का सरल अर्थ यह है कि अयोध्या, मथुरा, माया यानी हरिद्वार, काशी, कांचीपुरम, अवंतिका यानी उज्जैन, द्वारिकापुरी, ये सातों मोक्षदायीनी पवित्र नगरियां यानी पुरियां हैं।


ये सात शहर अलग-अलग देवी-देवताओं से संबंधित हैं। अयोध्या श्रीराम से संबंधित है। मथुरा और द्वारिका का संबंध श्रीकृष्ण से है। वाराणसी और उज्जैन शिवजी के तीर्थ हैं। हरिद्वार (मायापुरी) विष्णुजी और कांचीपुरम माता पार्वती से संबंधित है।


बचपन से मैंने मेरी मातोश्री से यह श्लोक सुना था पर इसमें माया क्या है यह समझ नहीं आता था | मेरे काम के सिलसिले में हाल ही मै हरिद्वार गया था और वही मुझे इस "माया" शब्द से मायापुरी और बाद में हरिद्वार यह चलन कैसे हुआ यह पता चला | तो आज मै आपको इसी बारेमे कुछ बताना चाहूंगा |


हरिद्वार—गंगा की गोद में बसा वह पवित्र नगर, जहाँ अध्यात्म हवा में घुला रहता है और हर श्वास में एक सूक्ष्म प्रकाश की अनुभूति होती है। इसी हरिद्वार का प्राचीन और अद्भुत नाम है ‘मायापुरी’—देवी माया को समर्पित वह पवित्र तीर्थ, जहाँ मानव मात्र अपने भीतर छिपे सत्य, सौंदर्य और संस्कारों का साक्षात्कार करता है।


मायापुरी, जिसका अर्थ है “माया का नगर”, वास्तव में केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि एक दिव्य ऊर्जा-क्षेत्र है। ऐसा विश्वास है कि यहाँ आकर मनुष्य अपने समस्त बंधनों, भ्रमों और दुःखों की परतें उतार देता है, और केवल आत्मा का शुद्ध प्रकाश शेष रह जाता है। गंगा किनारे खड़े होकर जब भक्त “हर हर गंगे” का उद्गार करते हैं, तो मानो सम्पूर्ण ब्रह्मांड उनके स्वर से गुंजायमान हो उठता है।


मायापुरी (हरिद्वार) की आध्यात्मिक अनुभूति


मायापुरी में कदम रखते ही ऐसा प्रतीत होता है मानो किसी अदृश्य शक्ति के स्पर्श ने मन में शांति का दीप जला दिया हो। पुरातन गलियाँ, मंदिरों की घण्टियाँ, गंगा की अविरल धारा और साधु-संतों की मर्मस्पर्शी वाणी—सब मिलकर एक ऐसी अनुभूति रचते हैं जिसे शब्दों में बाँधना कठिन है।


गंगा आरती के समय हर की पौड़ी पर जलते हजारों दीप, हवा में थिरकते शंखनाद और आकाश में तैरती सुगंध—यह सब मिलकर ऐसा वातावरण रचते हैं कि मन अनायास ही प्रार्थना में झुक जाता है।


‘मायापुरी की शाम’

गंगा की लहरों पर जब सूर्य सुनहरी चादर बिछाता है,

मायापुरी की संध्या स्वयं देवत्व का स्वर बन जाती है।

घण्टियों की धुन में छिपा आकाश का मौन,

दीपों की कतार में उजला जीवन का कोमल कोन।


यहाँ हर कदम पर आस्था के फूल खिलते हैं,

और मन के भीतर छिपे सारे द्वंद्व पिघलते हैं।

हे मायापुरी, तेरी मिट्टी में कुछ ऐसा जादू है—

जहाँ भटकता मन भी अपना मार्ग पा लेता है।



माया देवी मंदिर: हरिद्वार की अधिष्ठात्री का महापीठ



हरिद्वार का हृदय यदि गंगा है, तो उसकी आत्मा माया देवी मंदिर है। यह मंदिर हरिद्वार के उन तीन प्राचीन शक्ति-पेठों में से एक है जिनका उल्लेख प्राचीन पुराणों और तंत्र ग्रंथों में मिलता है। माना जाता है कि जहाँ-जहाँ सती के अंग गिरे, वहाँ-वहाँ शक्ति पीठों की स्थापना हुई। हरिद्वार के इस मंदिर में सती की नाभि और हृदय गिरने का उल्लेख आता है।


माया देवी को त्रिदेवी मानी जाती हैं—माया (शक्ति), काली (संरक्षक), और कामाख्या (सृजन)। माया देवी का स्वरूप अत्यंत मंगलकारी और करुणामयी है। भक्त जब उनके दरबार में पहुँचते हैं, तो ऐसा लगता है कि माँ स्वयं उन्हें अपने आंचल में समेट लेती हैं।


मंदिर भलेही आज के दौर में सीमेंट से बना है पर उसमे निवास करने वाले माँ माया के विग्रह प्राचीन है अपने भीतर इतिहास की गूँज समेटे हुए है।

सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद आपको माँ की प्रतिमा, गर्भगृह में जलते दीप, अद्भुत मूर्तिकला दिखाई देती है और वातावरण में फैला तांत्रिक और वैदिक स्पर्श इसे अत्यंत विशिष्ट बनाता है। गर्भगृह में स्थित देवी की प्रतिमा तेजोमयी है—मानो स्वर्णिम आभा से आवृत्त। मंदिर के भीतर चारो और देवी के अनेक अवतार तथा शिव भगवान की अनेक लिंग स्वरूप प्रतिमा है | यह मंदिर देश के सबसे बड़ा आखाड़ा जूना अखाड़ा (या भैरव अखाड़ा) के द्वारा संचालित है | मंदिर के बाहर ही भगवान दत्तात्रेय की चरण पादुका है तथा थोड़ेही दूर जाने के बाद आपको भैरव जी का मंदिर, भगवान दत्तात्रेय का मन्दिर दिखाई देता है | यहाँ स्थित दत्त भगवान की मूर्ति बहुत अद्भुत है जहा भगवान आपने त्रिमूर्ति रूप में घुटने पर हाथ रखें बैठे है |


कहा जाता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से माया देवी के सम्मुख अपनी मनोकामनाएँ रखते हैं, माँ उन्हें पूर्ण करती हैं—परंतु केवल भौतिक सफलता ही नहीं, बल्कि अंतःकरण की शांति भी प्रदान करती हैं।


यह भी मान्यता है कि हरिद्वार की यात्रा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती जब तक माया देवी मंदिर के दर्शन न कर लिए जाएँ।


गंगा की ठंडी हवा जब मायापुरी की गलियों से होकर मेरे चेहरे को छूती थी, तो ऐसा लगता था जैसे किसी ने अदृश्य हाथों से मेरे मन की धूल झाड़ दी हो। माया देवी मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए हर कदम के साथ एक अनोखी शांति भीतर उतरती चली गई। गर्भगृह में पहुँचकर जलते दीपों की लौ मानो मेरे भीतर के अंधकार को पढ़ रही थी। बाहर निकलकर जब दृष्टि फिर से गंगा की ओर गई, तो लगा कि यह नदी नहीं, स्वयं समय की अनन्त धारा बह रही है। इस यात्रा ने मुझे केवल हरिद्वार नहीं दिखाया—इसने मुझे स्वयं से मिलवाया।


मायापुरी और माया देवी मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि मन को जागृत करने वाले ऊर्जा-स्थल हैं। जो भी यहाँ आता है, वह अपने साथ शांति, प्रकाश और विश्वास का एक नया दीप लेकर लौटता है।


अंतत: मै इतना कहना चाहूंगा ..


"माँ माया का आंचल"


माँ माया के आंचल में जैसे सागर की शांति,

जैसे चंद्रिमा की चादर में छिपी कोमल कांति।

उनके द्वार पर खड़े होते ही मन हल्का हो जाता है,

दुःख का बोझ, थकान का भार हर पल खो जाता है।


हे माँ, तेरी मुस्कान में करुणा का अमृत बरसता है,

तेरे चरणों में बैठकर मन सब कड़वाहट से तरसता है।

आशीष की तेरी धारा यूँ ही बहती रहे सदा—

माया देवी, तू है शक्ति, तू है जग का परम प्रदा।


लेखक

डॉ श्री अमृत करमरकर

 
 
 

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